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पुलिस-मीडिया समन्वय में आई ‘दूरी’ से पत्रकारों में रोष, मासिक संवाद और त्वरित सूचना तंत्र की उठी मांग।

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संवाददाता: डॉ.अरशद हुसैन/न्यूज1उत्तराखंड

देहरादून/हरिद्वार। उत्तराखंड प्रदेश में पुलिस प्रशासन और मीडिया के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान को लेकर असंतोष के स्वर मुखर होने लगे हैं। जिले में पुलिस की कार्यप्रणाली और पत्रकारों तक सूचना पहुंचने की सुस्त रफ्तार ने अब एक नई बहस छेड़ दी है। मीडिया जगत का आरोप है कि सूचना तंत्र में आई इस ‘ढील’ के कारण न केवल खबरों की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है, बल्कि पुलिस की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

परंपरागत सूचना तंत्र हुआ ध्वस्त!

बता दें कि पूर्व में पुलिस और मीडिया के बीच एक बेहतर तालमेल देखने को मिलता था। जब भी पुलिस द्वारा कोई बड़ा चेकिंग अभियान, बड़ी कार्रवाई या किसी हाई-प्रोफाइल अभियुक्त को न्यायालय में पेश किया जाता था, तो पत्रकारों को इसकी पूर्व सूचना दे दी जाती थी। इससे मीडियाकर्मी समय पर मौके पर पहुंचकर तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और विजुअल कवरेज (फोटो-वीडियो) कर पाते थे।

लेकिन अब पत्रकारों का कहना है कि स्थिति बदल चुकी है। कई महत्वपूर्ण कार्रवाइयों की जानकारी मीडिया को तब मिलती है जब घटनाक्रम समाप्त हो चुका होता है। इससे मीडिया को कवरेज के उचित अवसर नहीं मिल पा रहे हैं, जिसका सीधा असर खबर के प्रभाव और जनहित पर पड़ रहा है।

पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर संकट

पत्रकारों के अनुसार, सूचनाओं के अभाव में जनता तक पूरी जानकारी समय पर नहीं पहुंच पा रही है। यदि मीडिया को मौके पर जाने का मौका नहीं मिलता, तो पुलिसिया कार्रवाई की पारदर्शिता पर भी सवाल उठते हैं। विशेषज्ञों का भी मानना है कि लोकतंत्र के इन दो स्तंभों (पुलिस और मीडिया) के बीच संवादहीनता जनता के विश्वास को कमजोर करती है।

मीडिया जगत ने रखे प्रमुख सुझाव:

बढ़ते असंतोष के बीच मीडियाकर्मियों ने पुलिस प्रशासन के समक्ष दो प्रमुख मांगें रखी हैं:

त्वरित सूचना प्रणाली: एक आधिकारिक मीडिया व्हाट्सऐप ग्रुप या डिजिटल तंत्र विकसित किया जाए, जहाँ हर छोटी-बड़ी कार्रवाई की सूचना तत्काल साझा की जाए।

मासिक संवाद बैठक: जिले के आला अधिकारी महीने में कम से कम एक बार पत्रकारों के साथ औपचारिक बैठक करें। इसमें कार्यप्रणाली, चुनौतियों और जनहित के मुद्दों पर खुला संवाद हो।

“पुलिस और मीडिया का आपसी समन्वय समाज में अपराध नियंत्रण और जागरूकता के लिए अनिवार्य है। सूचनाओं का समय पर मिलना पत्रकारों का अधिकार ही नहीं, बल्कि पुलिस की जवाबदेही भी है।” — वरिष्ठ पत्रकार

शासन और प्रशासन से उम्मीद

अब देखना यह है कि उत्तराखंड पुलिस और संबंधित जिले का प्रशासन इस मांग पर क्या रुख अपनाता है। क्या पुलिस महानिदेशक और शासन स्तर से जिलों को मीडिया के साथ समन्वय सुधारने के कड़े निर्देश जारी किए जाएंगे?

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