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भाजपा का कमल पसीने से खिलता है,पार्सल होकर आए पैसे से नहीं। यह फुसफुसाहट अब मंगलौर विधानसभा भाजपा में एक बड़े विद्रोह की आहट दे रहा है।

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संवाददाता:www.news1uttrakhand.in

मंगलौर (उत्तराखंड) की राजनीति में “धनबल बनाम जनबल” और स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी पर केंद्रित है।

मंगलौर का सियासी रण: क्या ‘धनबल’ की सुनामी में बह जाएगा भाजपा का वफादार कैडर?

रूड़की। मंगलौर विधानसभा की सियासी हवाओं में इन दिनों विकास के दावों से ज्यादा ‘नोटों की खनक’ चर्चा का विषय बनी हुई है। हरियाणा से आए राजनीति के माहिर खिलाड़ी करतार सिंह भड़ाना ने दान-पुण्य के नाम पर जिस तरह की ‘आर्थिक बिसात’ बिछानी शुरू की है, उसने भाजपा के अंदरूनी समीकरणों को हिलाकर रख दिया है।

दान या भविष्य की सियासी बिसात?

चर्चा है कि मंदिर-मस्जिद निर्माण के नाम पर गाँवों में भारी धनराशि बांटी जा रही है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह वाकई धार्मिक श्रद्धा है या फिर 2027 के विधानसभा चुनावों की सत्ता हथियाने के लिए बुना गया एक सुनियोजित जाल? स्थानीय लोग अब खुलेआम पूछने लगे हैं कि क्या ‘नोटों की गड्डियां’ उन कार्यकर्ताओं के पसीने की कीमत चुका पाएंगी जिन्होंने दशकों से पार्टी को सींचा है।

‘बाहरी’ बनाम ‘निष्ठावान’: भाजपा के भीतर सुलगती चिंगारी

सबसे कड़वा सच भाजपा के भीतर से ही निकलकर आ रहा है। दशकों से गलियों की धूल फांकने वाले और झंडा उठाने वाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं में गहरा असंतोष है। उनका मानना है कि:

* अस्तित्व का संकट: एक ‘बाहरी’ धनकुबेर चेहरा उनकी बरसों की तपस्या को मटियामेट करने पर उतारू है।

* स्वार्थी तत्वों का जमावड़ा: भड़ाना के इर्द-गिर्द आज जो हुजूम तालियां पीट रहा है, उनमें समर्पित सिपाही कम और ‘बहती गंगा में हाथ धोने वाले’ स्वार्थी तत्व ज्यादा हैं, जो चुनाव खत्म होते ही गायब हो जाएंगे।

> “भाजपा का कमल पसीने से खिलता है, पार्सल होकर आए रुपयों से नहीं।” — यह फुसफुसाहट अब मंगलौर भाजपा में एक बड़े विद्रोह की आहट दे रही है।

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2027 की राह: जीत का द्वार या आत्मघाती कदम?

यदि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने इस ‘पैसा बनाम पसीना’ की जंग को समय रहते नहीं रोका, तो मंगलौर की धरती 2027 में भाजपा के लिए जीत का द्वार नहीं, बल्कि आत्मघाती असंतोष का केंद्र बन सकती है। जनता ने 2024 के उपचुनाव में पहले ही संकेत दे दिया था कि वे बाहुबल और धनबल के ऊपर जनबल को प्राथमिकता देते हैं।

देखना यह होगा कि क्या संगठन अपने पुराने और वफादार कैडर के सम्मान को बचाए रखता है, या बाहरी धनबल के अहंकार और अपनों की नाराजगी के बीच ‘कमल’ खिलने से पहले ही मुरझा जाएगा।

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