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उत्तराखंड पुलिस अब नहीं सुलझाएगी ‘जमीन-जायदाद’ के लफड़े, डीजीपी दीपम सेठ का सख्त निर्देश: ‘सिविल मामलों में टांग अड़ाई तो होगी कार्रवाई’

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संवाददाता: शमशुल कुरैशी/news1uttrakhand.in

देहरादून। उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक डीजीपी दीपम सेठ ने कार्यभार संभालते ही पुलिस महकमे को अपनी प्राथमिकताओं का कड़ा संदेश दे दिया है। डीजीपी ने स्पष्ट किया है कि पुलिस का मूल काम अपराध नियंत्रण और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, न कि दीवानी (सिविल) विवादों में मध्यस्थता करना। उन्होंने सभी थाना प्रभारियों और पुलिस अधिकारियों को सचेत किया है कि वे निजी संपत्ति या पैसों के लेनदेन जैसे मामलों में हस्तक्षेप न करें।

आखिर क्यों लिया गया यह फैसला क्या है वजह अक्सर देखा जाता है कि जमीन के कब्जे, किरायेदारी या पारिवारिक विवादों में लोग पुलिस का सहारा लेकर दूसरे पक्ष पर दबाव बनाने की कोशिश करते हैं। ऐसे मामलों में पुलिस हस्तक्षेप से न केवल भ्रष्टाचार की संभावनाएं बढ़ती हैं, बल्कि पुलिस की छवि पर भी सवाल उठते हैं। डीजीपी ने चेतावनी दी है कि यदि कोई पुलिसकर्मी सिविल मामलों में दखल देता पाया गया, तो उसके खिलाफ कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

किन मामलों से दूर रहेगी पुलिस? सिविल मामलों की सूची)

अगर आपके विवाद की प्रकृति नीचे दी गई श्रेणियों में है, तो पुलिस उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। संपत्ति विवाद जमीन का मालिकाना हक, पुश्तैनी बंटवारा, कब्जे का विवाद या मकान मालिक-किरायेदार के झगड़े। पारिवारिक मामले में भी जैसे तलाक, बच्चों की कस्टडी, भरण-पोषण या उत्तराधिकार से जुड़े मामले। कॉन्ट्रैक्ट का उल्लंघन भी व्यापारिक समझौतों की शर्तों का टूटना या नौकरी से जुड़े अनुबंध भी शामिल है। आपके बता दें पैसे की वसूली या उधार दिए गए पैसे की वापसी या चेक बाउंस से जुड़े विवाद में भी पुलिस का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा।

मानहानि और लापरवाही। किसी की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाना या व्यक्तिगत लापरवाही के मामले में कानून की नजर में अंतर कब आएगी पुलिस?

साधारण शब्दों में समझें तो जब तक किसी विवाद में मारपीट, चोरी, धोखाधड़ी या कोई आपराधिक मंशा (क्रिमिनल इंटेंट) शामिल न हो, तब तक वह मामला ‘सिविल’ माना जाता है।

विशेष नोट: सिविल मामलों का निपटारा केवल दीवानी न्यायालय (सिविल कोर्ट ) के अधिकार क्षेत्र में आता है। पुलिस के पास यह तय करने का कानूनी हक नहीं है कि जमीन किसकी है या समझौता किस आधार पर होना चाहिए।

जनता के लिए संदेश

डीजीपी के इस निर्देश का उद्देश्य पुलिस को अनावश्यक दबाव से मुक्त करना और आम जनता को थानों के चक्कर काटने के बजाय सही कानूनी मंच (न्यायालय) तक पहुँचाना है। अगर कोई पुलिस अधिकारी आपको सिविल मामले में डराता या धमकाता है, तो आप इसकी शिकायत उच्चाधिकारियों से कर सकते हैं।

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